सफर ए जिन्दगी की अजीब दस्ता ।
सफर ए जिन्दगी की अजीब दस्ता । खिलते बचपन से शुरु हुआ रास्ता । दिन भर की मस्ती , घर में मम्मी की डांट। वो दादी नानी की ,कहानियां । भैया की डांट , वो दीदी का प्यार। स्कूल के वो सुकून भरे दिन । जान्हा मस्ती संग दोस्तो खेल । टीचर की वो डांट , जिसके मजे में दोस्तों का सुकून । एग्जाम में छुपके से दोस्तों को नकल करवाना । पकड़े जाने पर वो टीचर की मार आज भी याद आती है। स्कूल के सफर से कॉलेज का दौर । जन्हा दोस्त भी नजर आते थे चोर। कॉलेज के दिन जीवन का स्तंभ बने। सफर अब नौकरी की तलाश में चलता गया । ना जाने कब ये नसीब होगी । जैसे नौकरी मिली ,। फिर जिंदगी नई जिंदगी की तलाश में। पारिवारिक जीवन में जिमेदारियो के फर्ज में । कही बार व्यक्ति कर्ज के मर्ज में दबा । बच्चों की परवरिश में, अपनी खुशियों को ढूंढते । जिंदगी के सफर को काटते - काटते । अंत में आपनी मो माया और काया को छोड़कर। आत्मा को परमात्मा में , विलीन कर देता है। ...


Comments
Post a Comment