ना जाने ऐसा क्या वर्षा में ,

  ना जाने ऐसा क्या वर्षा में ,

 आने से उसके मेरे मन में , प्रसंता की की बाहर आ गई ।

 चारो ओर हरियाली सी भांति, खुशियां छा गई हो मानो।

 जिनके गालों की चमक से , मेरा मन दमक जाए ।

 होठों की लाली जैसे बिजली सी चमक रही हो ।

 आखों में जैसे उसने ,प्यार का सारा समंदर समट रखा हो।

 जिनकी मधुर वाणी ने मुझको भी बना दिया है प्राणी।

 कदमों की चाल से धरा भी , खिल जाए ।

 खुसबू संग लिए पवन भी मिलने को आतुर ।

 देख खुबसूरती को चांद भी ईर्ष्या करने लगे ।

 तेज धूप में खड़ी वो सूरज मुखी सी लगे ।

 मानो सूरज के इंतजार में जिया तड़फ उठा हो ।

 आपकी सादगी भरी अदाओं के लाखों है कायल ।

 मगर हम भी आपकी खूब सुरती के दीवाने है।

 निराशाओ को आशाओं में बदलने वाली हो आप ।


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